विषय: फसलों की जड़ें – संरचना, प्रकार और कार्य
कृषि में हम अक्सर फसल के ऊपर दिखाई देने वाले भाग पर ध्यान देते हैं, लेकिन फसल का वास्तविक जीवन मिट्टी के नीचे होता है। जड़ें ही पौधों की जल अवशोषण प्रणाली, पोषण भंडार और आधार स्तंभ होती हैं। जितनी मजबूत और सक्रिय जड़ें होंगी, उतनी ही फसल तनाव सहनशील, रोग प्रतिरोधक और अधिक उत्पादक होगी।
जड़ों की संरचना और प्रकार
जड़ों की संरचना फसल के प्रकार पर निर्भर करती है। कुछ फसलों में मुख्य गहरी जाने वाली जड़ें होती हैं जिन्हें टैप रूट सिस्टम कहते हैं, जबकि कुछ फसलों में रेशेदार जड़ें होती हैं। संतरा, आम और अनार जैसे फलों के पेड़ों की जड़ें सामान्यतः 2 से 3 फीट गहराई तक जाती हैं और पेड़ की छाया से डेढ़ से दो गुना क्षेत्र में फैलती हैं। इसलिए उर्वरक तने के पास न देकर ड्रिप लाइन क्षेत्र में देना अधिक लाभकारी होता है।
जड़ों के मुख्य कार्य
जड़ों का मुख्य कार्य मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों का अवशोषण, पौधे को सहारा देना और सूक्ष्मजीवों के माध्यम से पोषण उपलब्ध कराना है। जड़ों के आसपास का क्षेत्र जिसे राइजोस्पीयर कहा जाता है, वहां लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं जो नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश को पौधों के लिए उपलब्ध बनाते हैं।
जड़ों के विकास के लिए आवश्यक तत्व
जड़ों के अच्छे विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त ऑर्गेनिक कार्बन होना आवश्यक है। गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, ह्यूमिक और फुल्विक एसिड उपयोगी होते हैं। साथ ही एजोटोबैक्टर, पीएसबी और माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरक जड़ों की लंबाई, मोटाई और कार्यक्षमता बढ़ाते हैं। उचित जल निकास और जलभराव से बचाव भी अत्यंत आवश्यक है।
जड़ों के खराब होने के प्रभाव
जड़ों को नुकसान होने पर फसल की वृद्धि सीधे प्रभावित होती है। अधिक पानी, मिट्टी की कठोरता, लवणता, गलत रासायनिक छिड़काव और अत्यधिक उर्वरकों से जड़ सड़न होती है। इससे पोषक तत्वों का अवशोषण घटता है, पत्तियां पीली पड़ती हैं, फूल झड़ते हैं और उत्पादन कम होता है। कई बार रोगों का मुख्य कारण जड़ों का खराब स्वास्थ्य होता है।
निष्कर्ष
सफल खेती के लिए केवल फसल के ऊपरी भाग पर नहीं बल्कि जड़ों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। मजबूत जड़ें मजबूत फसल की नींव होती हैं, और मजबूत फसल ही स्थिर और भरोसेमंद उत्पादन देती है। यही टिकाऊ कृषि की असली कुंजी है।