अम्लीय मिट्टी और उसके सुधार के उपाय
कृषि में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी का pH संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है। कई क्षेत्रों में फसल उत्पादन कम होने का एक प्रमुख कारण अम्लीय मिट्टी है। सही जानकारी और वैज्ञानिक उपाय अपनाकर ऐसी मिट्टी को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है।
अम्लीय मिट्टी क्या होती है
जिस मिट्टी का pH 6.5 से कम होता है, उसे अम्लीय मिट्टी कहा जाता है। भारत में केरल, कोकण क्षेत्र, पश्चिमी घाट तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ऐसी मिट्टियाँ अधिक पाई जाती हैं। ये मिट्टियाँ प्रायः लेटराइट (Laterite) प्रकार की होती हैं।
अम्लीय मिट्टी की विशेषताएँ
अम्लीय मिट्टी में लोहा (Iron) और एल्युमिनियम (Aluminium) सक्रिय रूप में अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इसके कारण
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फॉस्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम की उपलब्धता कम हो जाती है
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जड़ों का विकास ठीक से नहीं होता
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फसल की वृद्धि रुक जाती है
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अंततः उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
अम्लीयता के प्रमुख कारण
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अधिक वर्षा के कारण कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे क्षारों का बह जाना
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सल्फेट और नाइट्रेट रूप वाले उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
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लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों का लगातार प्रयोग
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जैविक पदार्थों की कमी
अम्लीय मिट्टी सुधारने के उपाय
1) चूने का प्रयोग
चूना (Lime), डोलोमाइट या कैल्शियम कार्बोनेट का मिट्टी परीक्षण के अनुसार उपयोग सबसे प्रभावी उपाय है। इससे मिट्टी का pH बढ़ता है, एल्युमिनियम के दुष्प्रभाव कम होते हैं और पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधरती है।
2) जैविक पदार्थों का उपयोग
गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और वर्मी-कम्पोस्ट के नियमित उपयोग से मिट्टी की जैविक क्रिया बढ़ती है और अम्लीयता धीरे-धीरे कम होती है।
3) संतुलित उर्वरक प्रबंधन
अमोनियम सल्फेट जैसे अम्ल उत्पन्न करने वाले उर्वरकों का सीमित उपयोग करें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।
4) उपयुक्त फसलों का चयन
धान, काजू, अनानास, चाय और मसाले जैसी फसलें अम्लीय मिट्टी में अपेक्षाकृत अच्छी वृद्धि करती हैं।
निष्कर्ष
अम्लीय मिट्टी का अर्थ अनुपजाऊ मिट्टी नहीं है। मिट्टी परीक्षण, सही सुधारात्मक उपाय और सतत प्रबंधन द्वारा ऐसी मिट्टी को भी उच्च उत्पादन देने योग्य बनाया जा सकता है। मिट्टी को समझकर की गई खेती ही सफल और शाश्वत कृषि की कुंजी है।